Monday, September 12, 2011


ऐसे गुजारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब।
रह-रह पुकारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब॥
अब दूरियों का दिल पे, बहुत बोझ लग रहा,
बेवश निहारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब॥
दिल मैं हुई है शिरकत, उस अजनबी की जब,
दिल मैं उतारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब॥
सांसों ने उसकी जबसे, मेरे जिस्म को छुआ है,
हर पल संवारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब॥
आँखों में बसी उसकी , सूरत वो सुहानी सी,
अक्सों में निखारता हूँ, मैं ज़िन्दगी को अब॥

डॉ० अनुज भदौरिया

Monday, August 22, 2011

अब जागो ऐ सोने वालो!
ताल ठोंक कर कदम मिला लो॥
बहुत हो चुकी नींद तुम्हारी,
रातें ढली सभी अंधियारी;
अब जागो ऐ वीर सपूतो,
देश तके उम्मीद तुम्हारी;
किस मादकता में डूबे हो,
सोचो,समझो, होश संभालो।।अब जागो ऐ सोने वालो!
अब सोये तो सुबह न होगी,
जगने की फिर वजह न होगी;
वतन सुलगता रहा अगर तो,
अमन-चैन की जगह न होगी;
मुश्किल में हालात देश के ,
आओ मिल सब इसे बचा लो॥ अब जागो ऐ सोने वालो!
क्या हिन्दू? क्या मुस्लिम भाई ?
क्या सिख या कोई ईसाई?
साथ चले जब एक राह पर,
सबने मिलकर मंजिल पायी;
किस उलझन में दूर खड़े हो,
राग-द्वेष सब आज मिटा लो॥ अब जागो ऐ सोने वालो!
एक वृद्ध जब चला अकेला,
जन-समूह का आया रेला;
धीरे-धीरे पंक्ति बनी इक,
आज पंक्ति से बना है मेला;
आज दिखा दो ताकत अपनी,
एक तमाशा तुम कर डालो॥ अब जागो ऐ सोने वालो!
व्यर्थ नहीं होती कुर्वानी,
रोज नहीं आती है जवानी;
अगर राष्ट्र-हित खून न खौला,
खून नहीं, वो होता पानी;
कभी देश की खातिर मिलती,
मौत अगर तो गले लगा लो॥ अब जागो ऐ सोने वालो!
मिल कर भ्रष्टाचार मिटा दो,
कुटिल नीतियां यार मिटा दो;
गर विरोध में आये सामने,
तो सब मिल सरकार मिटा दो;
अखंड देश का गौरव जिसमें,
ऐसा सुन्दर देश सजा लो॥ अब जागो ऐ सोने वालो!

 डॉ० अनुज भदौरिया ' जालौनवी '
१२७०, नया रामनगर, उरई ( जालौन ) उ० प्र०
२८५००१
दूरभाष- ०५१६२-२५५४५१
चल दूरभाष- ०९४१५१६९९३६



Sunday, August 14, 2011

Saturday, August 13, 2011

कोई जब दिलनशीन लगता है।


कोई जब दिलनशीन लगता है।
सारा आलम हसीन लगता है॥

उसकी सांसों से मैं महकता हूँ,
जिस्म ताज़ातरीन लगता है॥

उसकी हर-एक अदा का कायल हूँ,
मुझको वो नाजनीन लगता है॥

उसका अहसास जब भी छूता है,
ज़िन्दगी पर यकीन लगता है॥


डॉ० अनुज भदौरिया

Monday, August 8, 2011

Sunday, August 7, 2011