Monday, August 8, 2011

Sunday, August 7, 2011

Wednesday, August 3, 2011

मेरी कश्ती

क्या-क्या सितम

क्या-क्या सितम ज़माने के हँसकर गुजरता।
किस्मत की इक लकीर को लिखता-मिटारता॥
ख्वाबों के घरोंदों की अजाब खासियत है ये ,
हर रोज़ उन्हें नीद से जगकर निखरता॥
यादों की लकीरों से कोई अक्स बन गया,
उसको कभी रोकर कभी हँसकर संवारता।।
हर दर्द मुनासिब है मुझे प्यार के लिए,
सीने में हर-एक दर्द को छिपाकर उतारता॥
उल्फत का रंग खून-ए-जिगर से मिला 'अनुज',
अब ज़िन्दगी की राहें रह-रहकर निहारता॥

मैं हवाओं का रुख बदल देता।

मैं हवाओं का रुख बदल देता।
वो अगर साथ मेरे चल देता॥
मेरी इतनी सी खता उसको हमराह चुना,
हाथ को थमने का न कोई शगल देता।
हुस्न पर नाज़ उसे दिल पे मुझे नाज़ रहा,
या खुदा दिल उसे मुझको तू शकल देता।
मेरे अल्फाज़ मेरे सारे तराने होते,
वो अगर पास मैं होता तो मैं ग़ज़ल देता।
उसकी हर याद मेरे दिल को तसल्ली देती,
जुस्तुजू थी कोई दिल मैं मेरे हलचल देता।